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मध्यप्रदेशराज्य

सांदीपनि आश्रम में भगवान कृष्ण के लिए ठंड से बचाव का इंतज़ाम, रखी गई अंगीठी और गर्म वस्त्र

Last updated: 2025/11/08 at 6:09 PM
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6 Min Read
सांदीपनि आश्रम में भगवान कृष्ण के लिए ठंड से बचाव का इंतज़ाम, रखी गई अंगीठी और गर्म वस्त्र
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उज्जैन
 विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल की नगरी मे कई ऐसे धार्मिक स्थल है, जिनकी परम्परा मे मौसम के हिसाब से बदलाव होता है. इन दिनों मध्य प्रदेश सहित पूरे भारत में ठंड का प्रकोप शुरू हो गया है. कई जगह पर कोहरा भी छाया हुआ है. गिरते तापमान के कारण लोगों ने गर्म कपड़े पहनना शुरू कर दिया है. ऐसे में भगवान को भी ठंड से बचने के लिए गर्म कपड़े और अंगीठी लगाई जा रही है. उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में भगवान श्री कृष्ण, सुदामा, बलराम और गुरु सांदीपनि को गर्म कपड़े पहनाए गए हैं. उनके आगे अंगारों की जलती हुई अंगीठी भी लगाई गई है. जिससे भगवान को गर्माहट मिलती रहे.

ठंड बढ़ने के साथ ही सांदीपनि आश्रम में भी भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा के बाल रूप की सेवा-सुश्रुषा में बदलाव किया गया है। भगवान को सर्दी का एहसास न हो, इसलिए आश्रम में उनकी दिनचर्या में ऊनी वस्त्र, गर्म भोजन और संध्या के समय अंगीठी की व्यवस्था की गई है। साथ ही शाम को भगवान को गर्म दूध के साथ जलेबी का भोग भी लगाया जा रहा है।

पुजारी स्व.पं. रूपम व्यास की धर्मपत्नी
 सर्दी में भगवान की पोशाक व भोग आदि में परिवर्तन होता है. भगवान को सर्दी से बचाव के लिए गर्म सामग्री जैसे केसर का दूध, जलेबी आदि का भोग लगाया जाता है. सुबह व शाम ऊनी स्वेटर, टोपा, मोजे आदि गर्म वस्त्र धारण कराए जाते हैं. अलसुबह व शाम के समय सर्दी अधिक होती है, उस समय भगवान अंगीठी तापते हैं. दोनों समय सिगड़ी जलाकर उनके समक्ष रखी जाती है. महर्षि सांदीपनि व गुरुमाता को शाल धारण कराई जा रही है. भगवान को सर्दी से बचाने का यह क्रम बसंत पंचमी के अगले दिन तक चलेगा.

बाल रूप के अनुरूप होती है सेवा

सांदीपनि आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की सेवा बाल स्वरूप में की जाती है। पंडित कीर्ति व्यास के अनुसार पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने यहां 11 वर्ष की आयु में शिक्षा ग्रहण की थी। इसलिए आज भी उनकी बाल रूप में सेवा की जाती है। जैसे ही सर्दी बढ़ती है, भगवान को ऊनी वस्त्र पहनाए जाते हैं और प्रतिमा के समीप अलाव की व्यवस्था की जाती है, ताकि ठंड का प्रभाव न पड़े।

मकर संक्रांति तक जारी रहेगा यह क्रम

पंडित व्यास ने बताया कि सूर्यदेव के उत्तरायण होने तक यह विशेष शीतकालीन सेवा जारी रहेगी। आश्रम में रोजाना शाम को अंगीठी जलाकर रखी जाती है और भगवान की सेवा-विधि में गर्माहट प्रदान करने वाले सभी आवश्यक उपाय शामिल रहते हैं।

वर्षो पुरानी है मंदिर की परम्परा 
यह मंदिर काफ़ी प्राचीन है. यहा पर भगवान श्री कृष्णा 11 साल 7 दिन की उम्र में आए थे. उस समय अनादि काल में जब भगवान श्री कृष्णा उज्जैन आए थे. करीब आज से 5267 साल पहले द्वापर युग में जब से यह परम्परा चली आ रही है. उस समय जब गुरु माता उनका ध्यान रखती थी. उन्हें गर्म वस्त्र पहनने के साथ गर्म भोजन करवाती थी. उसी अनुसार पुजारी परिवार संदीपनी वंश परम्परा मे ही है. वही परम्परा हम आज भी निर्वहन कर रहे है.

भोजन के लिए आज भी जलता है चुहला 
भगवान श्री कृष्णा के लिए आज भी मंदिर परिसर मे एक चुहला बना हुआ है. जिसके ऊपर भगवान का शुद्ध भोजन बनता है. रोजाना यहा पर पुजारी परिवार के दुवारा सुबह शाम भोजन बनाने के बाद भगवान को भोजन दिया जाता है. सांदीपनी आश्रण मे करीब 5000 साल पहले श्री कृष्ण बलराम और सुदामा उज्जैन के आश्रम में गुरु संदीपनी से शिक्षा ग्रहण करने आये थे, जिसके बाद श्री कृष्ण ने उज्जैन के संदीपनी आश्रम में रहकर ही 64 दिन में 64 विद्या और 16 कला का ज्ञान सीखा था.

भगवान को गर्म दूध, गाजर का हलवा, जलेबी, गराडू का भोग

सांदीपनि आश्रम में बाल रूप में विराजित भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुदामा को ठंड के दिनों में गर्म कपड़े पहनाने के साथ ही भगवान की दिनचर्या में भी परिवर्तन हो जाता है। भगवान को ठंड शुरू होते ही सुबह भोग में गर्म मीठा दूध, गाजर का हलवा, जलेबी, गराडू के साथ भोग आरती में गर्म लड्डू, बाफले, दाल, चावल और सब्जी का भोग अर्पित किया जाता है।

11 वर्ष की उम्र में शिक्षा ग्रहण की थी

मंदिर के पुजारी कीर्ति व्यास ने बताया कि करीब 5 हजार 200 से भी ज्यादा वर्ष पहले भगवान कृष्ण उज्जैन में महर्षि सांदीपनि से शिक्षा लेने आए थे। तब उनकी उम्र 11 साल 7 दिन थी। यहीं पर उनकी दोस्ती हुई थी सुदामा जी से और भगवान श्री कृष्ण ने 64 दिनों में 64 विद्या और 16 कलाएं आश्रम से प्राप्त की थीं।

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